जाने कैसे हुआ जैन धर्म का उदय और उसके सिद्धांतो के बारे में ?

जैन धर्म एक ऐसा धर्म  है जिसके धर्म  गुरु बिना वस्त्र,शाकाहारी भोजन जैसे सिद्धांतो का पालन करते है.जैन धर्म  के संस्थापकों को तीर्थंकर कहा जाता है. बता दे की जैन धर्म के कुल मिलाकर 24 तीर्थंकर थे जिनमे सबसे पहले ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे.उनका मूल नाम आदिनाथ था.

साथ ही उन्होंने कैलाश पर्वत पर शरीर का त्याग किया था जिसका उल्लेख ऋग्वेद में पहले से किया गया है और ऋग्वेद में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि में दो जैन तीर्थंकरों का वर्णन किया गया है.

आपको बता दे कि महावीर स्वामी जो थे वो जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे जिन्हे जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है.महज 30 साल की उम्र में उन्होंने अपने अग्रज नन्दी वर्द्धन से आज्ञा लेकर अपना घर त्याग दिया था. महावीर ने तक़रीबन 6 साल तक  तप किया.वही ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्हें कैवलिन नाम से जाना गया. महावीर ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद सब जगह जाकर इस ज्ञान का प्रसार किया, इस दौरान वो कई अनुयायियों से जुड़े जैसे राजा बिम्बिसार, चेटक और कुनिक प्रमुख थे .

अब जाने जैन धर्म के सिद्धांतो के बारे में


अहिंसा को जैन धर्म में सबसे मह्त्वपूर्ण सिद्धांत माना गया है.उन्हें अहिंसा बिल्कुल पसंद नहीं है इसके साथ ही इसमें मनुष्यलोक के दुखो को  मूल कारण बताया गया है क्योंकि उसके ऊपर सांसारिक इच्छाएं हावी रहती हैं और इच्छाएं ही दुःख का मूल कारण हैं जिस से मनुष्य जो होता है वो वृद्धावस्था और मृत्यु से प्रताड़ित रहता है.

त्याग और सन्यास से ही मनुष्य सही रास्ते पर चल सकता है.फिर उन्ही कर्मों के अनुसार अपना कर्मफल प्राप्त  करता है.कर्मफल से मुक्ति पा कर मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है.जैन धर्म में मुक्ति के लिए त्रिरत्न का उल्लेख किया गया है.जैन धर्म के त्रिरत्न सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण हैं.सम्यक ज्ञान के पांच प्रकार होते हैं.

1. जनित ज्ञान
2.  श्रवण ज्ञान
3.  दिव्य ज्ञान
4. पर्याय ज्ञान
5. कैवल्य ज्ञान

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